लेखक…… सैफुल्लाह कमर शिबली
आयतुल्लाह अली खामनई ईरान के सुप्रीम लीडर हैं, जो ईरानी क्रांति के बाद इस्लामी गणराज्य ईरान के सबसे शक्तिशाली धार्मिक और राजनीतिक नेता बने। वह केवल एक राजनेता ही नहीं बल्कि एक धार्मिक विद्वान, लेखक, कवि और जनता से जुड़े रहने वाले नेता हैं। उनका जीवन संघर्ष, शिक्षा और नेतृत्व का उदाहरण है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
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पूरा नाम: सैयद अली हुसैनी खामनई
जन्म: 17 जुलाई 1939
जन्म स्थान: मशहद शहर, ईरान
पिता: आयतुल्लाह सैयद जावाद हुसैनी खामनई – एक प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान
माता: एक साधारण मगर धार्मिक महिला, जो अपने बच्चों की इस्लामी परवरिश में बहुत ध्यान देती थीं।
अली खामनई एक धार्मिक परिवार में पले-बढ़े। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। वे गरीब थे, लेकिन धार्मिक शिक्षा में समर्पित थे। बचपन से ही वह क़ुरान, अरबी और फिक़्ह (इस्लामी कानून) की पढ़ाई में रुचि रखते थे।
शिक्षा
उन्होंने मशहद, क़ुम और नजफ़ (इराक़) जैसे इस्लामी शिक्षा के बड़े केंद्रों में शिक्षा प्राप्त की। वे बड़े-बड़े उलमा से पढ़े, जैसे:
आयतुल्लाह बोरुजर्दी
आयतुल्लाह खुमैनी (जो आगे चलकर ईरानी क्रांति के नेता बने)
खामनई ने हदीस, तफ़्सीर, फिक़्ह और उर्दू, अरबी व फारसी साहित्य में गहरी पकड़ हासिल की। इसके अलावा उन्होंने उर्दू और रूसी भाषा भी सीखी।
राजनीति में प्रवेश
सन 1962 से ही उन्होंने शाह-ए-ईरान (पहलवी शासन) के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना शुरू कर दिया। वे इस्लामी क्रांति के लिए काम करने वाले प्रमुख लोगों में से एक थे। शाह के समय उन्हें:
कई बार गिरफ्तार किया गया
जेल में डाला गया
यातनाएं दी गईं
निर्वासन (exile) भेजा गया
लेकिन उन्होंने अपने विचारों से पीछे हटने से इनकार कर दिया।
इस्लामी क्रांति और नेतृत्व
1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति आई, जिसकी अगुवाई आयतुल्लाह खुमैनी ने की। इस क्रांति के बाद:
शाह का शासन समाप्त हुआ
इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई
अली खामनई को संसद सदस्य, और फिर राष्ट्रपति बनाया गया
वे 1981 से 1989 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे। वह इकलौते ऐसे राष्ट्रपति थे जिन्होंने मौलवी (cleric) होते हुए यह पद संभाला।
सुप्रीम लीडर के रूप में
1989 में आयतुल्लाह खुमैनी की मृत्यु के बाद, अली खामनई को मजलिस-ए-खबरगान (विशेष परिषद) ने ईरान का सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) चुना। यह पद ईरान में सबसे ऊँचा होता है, जो:
सेना का प्रमुख होता है
न्यायपालिका की निगरानी करता है
धार्मिक मामलों में अंतिम authority होता है
विदेश नीति में भी बड़ा प्रभाव रखता है
विचारधारा और दर्शन
आयतुल्लाह खामनई का मानना है कि:
इस्लाम एक पूर्ण जीवन प्रणाली है
पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति मुसलमानों की आत्मा को कमजोर करती है
फिलिस्तीन की आज़ादी मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है
अमेरिका और इजरायल को मुस्लिम दुनिया के खिलाफ साज़िशकर्ता माना जाता है
उन्होंने “मक़ावमत” (resistance) की नीति को बढ़ावा दिया है, यानी ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना।
अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण
अली खामनई फिलिस्तीन, लेबनान, सीरिया, यमन और इराक में मुज़ाहिम ताक़तों को नैतिक समर्थन देते हैं।
अमेरिका के खिलाफ नारा “Death to America” एक राजनीतिक बयान बन गया है।
उन्होंने मुस्लिम यौवन को “इस्लामी जागरूकता” की तरफ बुलाया।
कई बार UN और अन्य संगठनों की दोहरी नीति की आलोचना की है।
साहित्य और लेखन
वे एक अच्छे लेखक, वक्ता और कवि भी हैं। उन्होंने कई किताबें लिखी हैं:
इस्लामी सरकार पर भाषण
जवानों के नाम पत्र
तारीख़ पर भाषण
वे उर्दू, फारसी, अरबी में लेखन और भाषण करते हैं।
निजी जीवन
उनकी पत्नी एक धार्मिक परिवार से हैं।
उनके कुछ बेटे और बेटियाँ धार्मिक और सामाजिक कार्यों से जुड़े हैं।
वे सादा जीवन जीते हैं — सादा कपड़े, कोई वैभव नहीं।
आम लोगों से मिलने में झिझकते नहीं।
आलोचना और समर्थन
समर्थन:
धार्मिक वर्ग, फौज, क्रांतिकारी युवा, और गरीब तबका उनका समर्थन करता है।
उन्होंने ईरान को आर्थिक, तकनीकी और सामरिक रूप से मज़बूत किया है।
आलोचना:
विपक्षी दल और पश्चिमी देश उन्हें तानाशाह कहते हैं
ईरान में इंटरनेट सेंसरशिप और महिला अधिकारों को लेकर आलोचना होती है
लेकिन वे इन बातों को “पश्चिमी प्रचार” मानते हैं
विरासत
आयतुल्लाह खामनई ने केवल शासन नहीं किया, बल्कि इस्लामी पहचान, आत्मनिर्भरता, और एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण किया।
उनकी विरासत है:
आत्मसम्मान
इस्लामी जागरूकता
पश्चिमी ग़ुलामी से आज़ादी
शहीदों की क़द्र
गरीबों और ज़ुल्म के शिकार लोगों के लिए आवाज़
आयतुल्लाह अली खामनई आज की दुनिया में एक ऐसे नेता हैं जो धर्म, राजनीति, और समाज तीनों को साथ लेकर चलते हैं।
उनकी ज़िंदगी हमें सिखाती है:
ईमान, इल्म और इस्तेक़ामत (दृढ़ता) से कोई भी ताक़त झुकाई जा सकती है।”