Saifullah Qamar Shibli
आज हम एक ऐसी महान शख्सियत की कहानी सुनाएंगे, जिनका नाम सुनते ही दिलों में ईमान की गर्मी और जिहाद की रूह जाग उठती है।
एक ऐसा जनरल, जिसने कभी हार नहीं देखी।
एक ऐसा मुजाहिद, जिसकी तलवार ने ज़ुल्म की सल्तनतों की जड़ें हिला दीं।
एक ऐसा मोमिन, जिसे नबी करीम ﷺ ने “सैफ़ुल्लाह” यानी “अल्लाह की तलवार” का लक़ब अता किया।
जी हाँ! हम बात कर रहे हैं हज़रत खालिद बिन वलीद (रज़ियल्लाहु अन्हु) की।
यह कहानी सिर्फ़ जंगों और फतहों की नहीं, बल्कि ईमान, इख़लास, आज़िज़ी और अल्लाह की रज़ा की तलाश की है।
तो आइए, इस अज़ीम हीरो की ज़िंदगी का सफ़र शुरू करते हैं!
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प्रारंभिक जीवन
हज़रत खालिद बिन वलीद (रज़ि.) का ताल्लुक क़ुरैश के मुअज्ज़ज़ क़बीला बनू मख़ज़ूम से था। आप लगभग 592 ईस्वी में मक्का में पैदा हुए।
आपके वालिद, वलीद बिन मुग़ीरा, मक्का के असरदार और दौलतमंद सरदारों में से थे।
खालिद (रज़ि.) बचपन से ही ग़ैरमामूली सलाहियतों के मालिक थे। घुड़सवारी, तीरंदाज़ी और तलवारबाज़ी में उनका कोई सानी न था।
उनकी जिस्मानी ताक़त, ज़ेहनी चालाकी और जंगी हिकमत-ए-अमली ने उन्हें मक्का के जवानों में मुमताज़ बना दिया था।
उनके भाई, वलीद बिन वलीद, भी एक बहादुर जवान थे, जिन्होंने बाद में इस्लाम क़बूल किया और खालिद (रज़ि.) के लिए एक बेहतरीन मिसाल बने।
उनकी वालिदा एक नेक ख़ातून थीं, जिन्होंने उनके दिल में बहादुरी और इज़्ज़त-ए-नफ़्स के जज़्बात पैदा किए।
इस्लाम दुश्मनी का दौर
प्रारंभिक जीवन में खालिद (रज़ि.) इस्लाम के सख़्त मुख़ालिफ थे। उनका ख़ानदान क़ुरैश का रईस था और वह अपनी क़बीलाई रवायतों के पाबंद थे।
जंग-ए-उहुद (3 हिजरी) में खालिद (रज़ि.) ने कुफ्फ़ार की फ़ौज की क़ियादत की। उन्होंने एक शानदार जंगी हिकमत-ए-अमली बनाई, जिसकी वजह से मुसलमानों को नुक़सान उठाना पड़ा।
जब मुसलमानों ने उहुद पहाड़ पर पोजीशन ली, तो खालिद (रज़ि.) ने मौक़ा देखकर अपनी घुड़सवार फ़ौज से हमला किया और मैदान का नक़्शा पलट दिया।
मगर अल्लाह तआला के मंसूबे कुछ और थे।
इस जंग के बाद खालिद (रज़ि.) के दिल में बेचैनी पैदा हुई।
वह सोचने लगे कि आख़िर ये दीन क्या है, जो लोगों के दिलों को फ़तह कर रहा है?
नबी करीम ﷺ की सच्चाई और किरदार ने उनके दिल को झिंझोड़ दिया।
इस्लाम क़बूल करना
सन् 8 हिजरी (629 ईस्वी) में खालिद (रज़ि.) ने अपने दिल की बेचैनी को सच्चाई की तलाश में तब्दील कर दिया।
वह अपने दोस्त अम्र बिन अल-आस (रज़ि.) और उस्मान बिन तलहा (रज़ि.) के साथ मदीना मुनव्वरा पहुँचे।
जब वह नबी करीम ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुए, तो आपने मुस्कुरा कर फ़रमाया:
“खालिद! मैं जानता था कि तुम जैसा ज़ेहिन और अक़्लमंद शख़्स एक दिन ज़रूर हक़ को क़बूल करेगा।“
खालिद (रज़ि.) ने कलमा पढ़ा और अपनी पूरी ज़िंदगी अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के लिए वक़्फ़ कर दी।
इस लम्हे से इस्लाम को एक ऐसी ताक़त मिली, जिसने तारीख़ का रुख़ बदल दिया।
“सैफ़ुल्लाह” का लक़ब
इस्लाम क़बूल करने के फ़ौरन बाद ही खालिद (रज़ि.) की सलाहियतें चमक उठीं।
सन् 8 हिजरी में ‘ग़ज़वा-ए-मौतह’ हुआ।
इस जंग में इस्लामी लश्कर के तीन कमांडर –
ज़ैद बिन हारिसा (रज़ि.),
जाफ़र बिन अबी तालिब (रज़ि.),
और अब्दुल्लाह बिन रवाहा (रज़ि.) – शहीद हो गए।
मैदान-ए-जंग में अफ़रातफ़री फैल गई।
इस नाज़ुक मौक़े पर खालिद (रज़ि.) ने झंडा सम्भाला।
उन्होंने एक ऐसी जंगी हिकमत-ए-अमली अपनाई कि 40,000 के इस्लामी लश्कर ने एक लाख से ज़्यादा रूमी फ़ौज का न सिर्फ़ मुक़ाबला किया, बल्कि महफ़ूज़ वापसी भी मुमकिन बनाई।
खालिद (रज़ि.) ने रात के वक़्त फ़ौज की तरतीब बदल दी, जिससे दुश्मन को ये धोखा हुआ कि इस्लामी लश्कर को मदद मिल गई है।
रूमी पीछे हटे और इस्लामी लश्कर मदीना वापस आया।
जब नबी करीम ﷺ को ये ख़बर मिली, तो आपने फ़रमाया:
“खालिद अल्लाह की तलवारों में से एक तलवार है, जिसे अल्लाह ने कुफ़्फ़ार पर नाज़िल किया।“
यही वो लम्हा था जब खालिद (रज़ि.) को “सैफ़ुल्लाह” का लक़ब मिला, जो तारीख़ में हमेशा के लिए अमर हो गया।
हज़रत खालिद (रज़ि.) की अज़ीम फतहें
हज़रत खालिद (रज़ि.) की जंगी सलाहियतों ने इस्लामी तारीख़ का सुनहरा दौर लिख डाला।
आइए उनकी कुछ अहम फतहों पर नज़र डालते हैं:
1. फ़त्ह मक्का (8 हिजरी / 630 ईस्वी)
खालिद (रज़ि.) ने फ़त्ह मक्का में एक अहम किरदार अदा किया।
नबी करीम ﷺ ने फ़ौज को चार हिस्सों में तक़सीम किया, और खालिद (रज़ि.) को एक हिस्से की क़ियादत सौंपी।
जब मक्का के लोगों ने मज़ाहमत की कोशिश की, तो खालिद (रज़ि.) ने अपनी घुड़सवार फ़ौज से फ़ौरन हमला किया और दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
वही मक्का, जहाँ कभी खालिद (रज़ि.) इस्लाम के खिलाफ़ लड़े थे, अब वो अल्लाह के दीन के फ़ातिह बनकर दाख़िल हुए।
2. ग़ज़वा-ए-हुनैन और ताइफ़ (8 हिजरी)
ग़ज़वा-ए-हुनैन में क़बीला हवाज़िन और स़कीफ़ ने एक बड़ी फ़ौज के साथ हमला किया।
शुरुआती तौर पर इस्लामी लश्कर मुश्किल में पड़ गया, लेकिन खालिद (रज़ि.) ने अपनी बहादुरी से मैदान सम्भाला।
उन्होंने दुश्मन के घात लगाने वाले दस्तों को बेनक़ाब किया और नबी ﷺ की क़ियादत में फ़तह हासिल की।
बाद में ताइफ़ के मुहासिरे में भी उन्होंने अहम किरदार निभाया।
3. जंग-ए-यमामा (11 हिजरी / 632 ईस्वी)
हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) के दौर में झूठे नबी मुसैलमा कज़्ज़ाब ने बग़ावत की।
खालिद (रज़ि.) ने इस फित्ने को कुचलने के लिए ज़बरदस्त मन्सूबा बनाया।
जंग-ए-यमामा में मुसैलमा की बड़ी फ़ौज के मुक़ाबले इस्लामी लश्कर ने जान तोड़ मुक़ाबला किया।
खालिद (रज़ि.) की क़ियादत में मुसैलमा को शिकस्त दी गई और वहशी बिन हरब (रज़ि.) ने उसे हलाक किया।
4. फ़त्ह-ए-इराक
अबूबक्र (रज़ि.) ने खालिद (रज़ि.) को ईरानी सल्तनत के ख़िलाफ़ भेजा।
उन्होंने क़ादिसिया, अंबार और अइनुत्तमर जैसे मआरिक़ में हैरान कर देने वाली फतहें हासिल कीं।
एक मशहूर वाक़िया है कि जब ईरानी फ़ौज ने दरिया-ए-फुरात को पार करने से रोका, तो खालिद (रज़ि.) ने अपनी फ़ौज को दरिया के एक ऐसे हिस्से से पार कराया जहाँ दुश्मन ने सोचा भी नहीं था।
5. फ़त्ह-ए-शाम – जंग-ए-यरमूक (13 हिजरी / 634 ईस्वी)
ये खालिद (रज़ि.) की सबसे अज़ीम फतहों में से एक है।
जंग-ए-यरमूक में रूमी सल्तनत ने एक बहुत बड़ी फ़ौज (1 से 2 लाख) जमा की थी, जबकि इस्लामी लश्कर सिर्फ़ 40,000 था।
खालिद (रज़ि.) ने अपनी शानदार हिकमत-ए-अमली से दुश्मन को चारों तरफ़ से घेर लिया।
छह दिन की शदीद लड़ाई के बाद इस्लामी लश्कर ने फ़तह हासिल की।
इस जंग ने शाम को हमेशा के लिए इस्लामी दुनिया का हिस्सा बना दिया।
इबादत, आज़िज़ी और किरदार
हज़रत खालिद (रज़ि.) सिर्फ़ एक जंगी हीरो ही नहीं, बल्कि एक सच्चे आबिद और आज़िज़ मोमिन भी थे।
वह रातों को नफ़्ल नमाज़ें पढ़ते, क़ुरआन की तिलावत करते और अल्लाह से मग़फ़िरत मांगते।
उनकी ज़िंदगी में दुनिया की कोई अहमियत न थी।
एक बार जब उनसे पूछा गया कि इतनी फतहों के बावजूद वह आज़िज़ क्यों रहते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया:
“मैंने हर जंग अल्लाह के नाम पर लड़ी, और फतह अल्लाह ही की तरफ़ से आई।“
एक दिलचस्प वाक़िया यह है कि जब खालिद (रज़ि.) अपनी फ़ौज के साथ सफ़र करते, तो वह आम सिपाहियों के साथ ज़मीन पर बैठकर खाना खाते और हँसी-मज़ाक़ करते।
उनकी आज़िज़ी ने हर सिपाही के दिल में उनके लिए मोहब्बत पैदा कर दी थी।
ओहदे से मुअज़्ज़ली
हज़रत उमर बिन खत्ताब (रज़ि.) के दौर-ए-ख़िलाफ़त में खालिद (रज़ि.) को सिपहसालारी से हटा दिया गया।
इसकी वजह यह थी कि लोग फतहों का सहरा खालिद (रज़ि.) के सिर बाँधने लगे थे और हज़रत उमर (रज़ि.) चाहते थे कि उम्मत को ये याद रहे कि फतह अल्लाह की तरफ़ से होती है, न कि किसी इंसान की वजह से।
जब खालिद (रज़ि.) को यह ख़बर मिली, तो उन्होंने कोई शिकायत न की।
उन्होंने कहा:
“मैं अल्लाह के लिए लड़ता हूँ, उमर के लिए नहीं।“
इसके बाद भी वह एक आम सिपाही की हैसियत से जिहाद में शरीक होते रहे।
यह उनकी आज़िज़ी और ईमान की अज़ीम मिसाल है।
वफ़ात
सन् 21 हिजरी (642 ईस्वी) में हज़रत खालिद बिन वलीद (रज़ि.) ने हिम्स (शाम) में वफ़ात पाई।
मरते वक़्त उनके दिल में एक हसरत थी, जो उन्होंने यूँ बयान की:
“मैंने सौ से ज़्यादा जंगें लड़ीं। मेरे जिस्म पर कोई जगह ऐसी नहीं जहाँ तलवार, नेज़े या तीर का ज़ख़्म न हो। लेकिन अफ़सोस! मेरी मौत बिस्तर पर आई, जैसे बुज़दिल मरते हैं।“
उनकी वफ़ात पर हज़रत उमर (रज़ि.) की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने फ़रमाया:
“खालिद जैसा इंसान सदियों में पैदा होता है।“
हज़रत खालिद (रज़ि.) का पैग़ाम
हज़रत खालिद बिन वलीद (रज़ि.) की ज़िंदगी हमें कई सबक सिखाती है:
- इख़लास: अगर दिल में अल्लाह की रज़ा हो, तो दुश्मन भी दोस्त बन जाता है।
- बहादुरी: ईमान से पैदा होने वाली बहादुरी नामुमकिन को मुमकिन बना देती है।
- आज़िज़ी: शोहरत और ताक़त के बावजूद आज़िज़ रहना एक सच्चे मोमिन की पहचान है।
- भरोसा: जंग हो या अम्न, हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।
हज़रत खालिद बिन वलीद (रज़ियल्लाहु अन्हु) की ज़िंदगी एक ऐसी किताब है, जिसका हर पन्ना हिम्मत, ईमान और जिहाद की दास्तानों से भरा हुआ है।
वह सिर्फ़ एक फ़ौजी कमांडर नहीं थे, बल्कि अल्लाह के दीन के अज़ीम मुहाफ़िज़ थे।
उनकी ज़िंदगी हमें सिखाती है कि अगर हम इख़लास और ईमान के साथ अल्लाह की राह पर चलें, तो कोई मक़सद नामुमकिन नहीं।
अल्लाह तआला हज़रत खालिद बिन वलीद (रज़ि.) से राज़ी हो और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए।
आमीन।