Saifullah Qamar Shibli
क्या आपने कभी सोचा है कि कोई धार्मिक लीडर सिर्फ धर्म की बातें ही नहीं करता, बल्कि इंसानियत के लिए भी अपनी आवाज़ उठाता है?
क्या आपने कभी ऐसे मौलाना के बारे में सुना है जो मस्जिद और मदरसे से आगे बढ़कर स्कूल, हॉस्पिटल और यूनिवर्सिटी तक चला रहे हैं?
आज हम बात करेंगे भारत के ग्रैंड मुफ्ती, केरल के मशहूर इस्लामिक स्कॉलर — शेख अबूबकर अहमद साहब की।
और हम जानेंगे कि उन्होंने हाल ही में एक हिंदू नर्स नमिशा प्रिया को यमन में फांसी से बचाने के लिए कैसे इंसानियत की बड़ी मिसाल पेश की।
बचपन और शिक्षा
शेख अबूबकर अहमद साहब का जन्म 1939 में केरल के मलप्पुरम ज़िले में हुआ था।
उन्होंने छोटी उम्र में ही कुरान हिफ़्ज़ किया और फिर अरबी, इस्लामी फिक्ह, हदीस और अन्य दीन की शिक्षा हासिल की।
बाद में वो मिस्र की मशहूर यूनिवर्सिटी अल-अजहर गए और वहाँ से तालीम पूरी की।
शिक्षा और नेतृत्व
शेख साहब ने सिर्फ़ दीनी इल्म नहीं फैलाया, बल्कि उन्होंने मॉडर्न और इस्लामिक एजुकेशन को एक साथ मिलाकर एक बहुत बड़ा काम किया।
उन्होंने “जामिया मरकज़ुस्सकाफ़तुस्सुन्निया” की स्थापना की, जिसे लोग “मरकज़” के नाम से जानते हैं।
इस संस्था के ज़रिए:
- हज़ारों बच्चों को मुफ्त तालीम
- लड़कियों के लिए कॉलेज और हॉस्टल
- हॉस्पिटल और हेल्थ सेंटर
- दरज़नों स्कूल
- और यतीमों के लिए सहायता केंद्र
चला रहे हैं।
ग्रैंड मुफ्ती बनने का सफर
2004 में उन्हें “ग्रैंड मुफ्ती ऑफ इंडिया” का ख़िताब दिया गया।
ये कोई सरकारी पद नहीं, बल्कि उलेमा और समाज ने उन्हें ये दर्जा दिया — उनकी इल्मी गहराई, सादा जीवन, और इंसानी सोच को देखते हुए।
समाज सेवा और एकता का पैग़ाम
जब केरल में बाढ़ आई, शेख साहब खुद लोगों के बीच पहुंचे।
कोरोना महामारी में उन्होंने:
- ऑक्सीजन सिलेंडर पहुंचवाए
- अस्पतालों की मदद की
- गरीबों को खाना और दवा दी
- और बिना किसी धर्म के भेदभाव के सबकी सेवा की
वो हमेशा कहते हैं:
“मजहब इंसानियत के खिलाफ नहीं, बल्कि इंसानियत का साथी है।”
महिलाओं की शिक्षा के पैरोकार
शेख अबूबकर साहब ने मुस्लिम लड़कियों की तालीम पर ख़ास ज़ोर दिया।
उनकी संस्थाओं में हज़ारों लड़कियां मॉडर्न और इस्लामी दोनों तरह की शिक्षा ले रही हैं।
उनका मानना है:
“अगर एक औरत पढ़ेगी, तो पूरा घर पढ़ेगा।”
नर्स नमिशा प्रिया के लिए इंसानी कोशिश
अब आते हैं उस हालिया वाकये की तरफ़, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा।
नमिशा प्रिया नाम की एक हिंदू नर्स जो केरल की रहने वाली है, काम के सिलसिले में यमन गई थी।
वहाँ किसी कारण से एक व्यक्ति की मौत के मामले में, उन्हें क़त्ल का दोषी ठहराया गया।
यमन की अदालत ने उन्हें फांसी की सज़ा सुना दी।
जब उनकी माँ ने भारत सरकार, राष्ट्रपति और राज्य सरकार से मदद मांगी,
तब सबसे पहले जिस इंसान ने दिल से मदद की पेशकश की — वो थे शेख अबूबकर अहमद साहब।
उन्होंने:
- यमन में मृतक के परिवार से बात करने की कोशिश की
- माफीनामा (blood money) के ज़रिए सज़ा माफ करवाने की राह निकाली
- कानूनी मदद और पैसा देने की पेशकश की
- और इस मसले को इंसानियत की नज़र से देखने की अपील की
ये वो लम्हा था जब एक मुस्लिम आलिम ने साबित किया कि धर्म इंसानियत के रास्ते में नहीं आता, बल्कि उसके साथ खड़ा होता है।
शांति और मोहब्बत का पैग़ाम
शेख साहब का पूरा जीवन इस बात की मिसाल है कि:
- मज़हब को नफरत का ज़रिया नहीं, मोहब्बत का पुल बनाना चाहिए
- तालीम, दुआ, और सेवा — यही असली रास्ता है
- और अगर आप सच्चे हैं, तो हर मज़हब के लोग आपको दिल से सलाम करेंगे
आखिरी बात
शेख अबूबकर अहमद साहब आज भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के मुसलमानों और इंसानों के लिए एक रोल मॉडल हैं।
उन्होंने हमें दिखाया कि मस्जिद से यूनिवर्सिटी तक, और मिनबर से कोर्ट तक, इंसानियत हर जगह ज़िंदा की जा सकती है।
नमिशा प्रिया की माँ आज भी कहती हैं कि:
“हमें उम्मीद है — शेख साहब जैसे लोग ही हमारी बेटी की ज़िंदगी बचा सकते हैं।”
इस कहानी में एक गहरा सबक है:
- मज़हब अगर इंसानियत से जुदा हो जाए, तो सिर्फ रस्में बचती हैं
- लेकिन जब मज़हब इंसानियत के साथ चले — तो नर्स भी बचती है, और दिल भी जीतते हैं