आज का यूरोप, कल का यूरोप – इस्लामिक इतिहास का सुनहरा दौर और यूरोप का कर्ज़

क्या आपको पता है कि आज का यूरोप कभी इस्लामी दुनिया से पढ़ाई करने आता था? जानिए यूरोप पर इस्लाम की तहज़ीब और ज्ञान का असर।

Saifullah Qamar Shibli

क्या आप जानते हैं कि जो यूरोप आज दुनिया को पढ़ाई, तकनीक और तहज़ीब (संस्कृति) सिखा रहा है, वो कभी मुस्लिम दुनिया के दरवाज़े पर ज्ञान लेने आता था?जिस यूरोप को आज हम तरक्की और रोशनी का झंडा उठाने वाला मानते हैं, वो कभी इस्लामी दुनिया की किताबों, खोज और ज्ञान (Knowledge) से सीखता था। जर्मनी, फ्रांस, इटली और इंग्लैंड जैसे देशों से छात्र अंदलुस (Andalusia – आज का स्पेन) जाते थे — कुर्तुबा (Córdoba), गर्नाता (Granada) और तुलैतोला (Toledo) जैसे शहरों में पढ़ने।

जब मुसलमान थे पूरी दुनिया के टीचर


वो वक्त था जब मुसलमानों ने दुनिया को लीड किया था, खासकर इन इल्मों (Subjects) में:तिब (Medicine)फलसफा (Philosophy)हिसाब (Mathematics)जुगराफिया (Geography)फलकियात (Astronomy)इंसाफ (Justice)

अरबी ज़ुबान और इस्लामी तहज़ीब का असर

जो यूरोपी छात्र मुस्लिम इलाकों से पढ़कर लौटते थे, वो फ़क्र से कहते – हमने मुस्लिम दुनिया से पढ़ाई की है!यहाँ तक कि वे अरबी बोलते, मुस्लिम कपड़े पहनते और इस्लामी अंदाज़ अपनाते।जर्मन लेखिका Sigrid Hunke ने लिखा:> “यूरोप के नौजवान अरबों की नकल करते थे – कपड़ों से लेकर भाषा तक!”

एक ईसाई पादरी ने गुस्से में कहा:

> “हमारे लड़के अपनी मंगेतर को अरबी में कहते हैं ‘अहिब्बुक – أحبك’ यानी ‘मैं तुमसे मोहब्बत करता हूँ!'”

इस्लामिक दौर की कुछ झलकियाँ

कुर्तुबा में एक वक़्त पर 70 लाइब्रेरी (Libraries) थीं, जबकि यूरोप के कई देशों में एक भी नहीं थी।एजुकेशन फ्री (Free Education) थी – हर शहर में स्कूल और मदरसे थे।मुसलमानों ने Medicine, Astronomy, Mathematics, Chemistry, Philosophy पर हज़ारों किताबें लिखीं, जिन्हें यूरोप ने अनुवाद करके अपनी यूनिवर्सिटी में पढ़ाया।इब्न सीना (Ibn Sina – Medicine), इब्न रुश्द (Ibn Rushd – Philosophy), अल-राज़ी (Al-Razi – Chemistry), अल-ख्वारिज़्मी (Al-Khwarizmi – Mathematics), इब्न अल-हैथम (Ibn Al-Haytham – Optics & Physics) जैसे बड़े साइंटिस्ट यूरोप के सिलेबस में थे।

फिर क्या हुआ?

मुसलमान अपनी किताबें, रिसर्च और तालीम को भूल बैठे, और यूरोप वही रौशनी उठाकर आगे निकल गया।
जो कल तक हमारे स्कूलों के बाहर खड़ा था, आज हमें पीछे छोड़ चुका है।

अब हमें क्या करना है?

सिर्फ पुराने गौरव पर गर्व करना काफी नहीं है। अब ज़रूरत है कि:फिर से पढ़ना (Iqra – اقرأ) शुरू करेंIlm (Knowledge) की तरफ़ लौटेंResearch और सोच को अपनाएंदुनिया को फिर से दिखाएं कि मुसलमान सिर्फ़ तारीख़ का हिस्सा नहीं हैं – हम आज भी कुछ कर सकते हैं

क्या हम फिर से उस मक़ाम पर लौट सकते हैं?

क्या हम वो मुसलमान बन सकते हैं जो दुनिया को तालीम, तहज़ीब और इंसाफ़ का तोहफ़ा देते थे?अगर इरादा पक्का हो, मेहनत लगातार हो, और नियत साफ़ हो, तो बिल्कुल हाँ!

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