लेखक _ सैफुल्लाह कमर शिबली
पिछली कड़ी में हमने कर्बला की जड़ों को अब्दे मुनाफ़ के दौर से समझना शुरू किया था। अगर आपने वो लेख नहीं देखा है, तो नीचे लिंक दिया गया है, पहले उसे जरूर देखें।
आज हम बात करेंगे हाशिम की ज़िंदगी, उनके कामों और उस परिवार की जो सदियों बाद कर्बला के मैदान में कुर्बानी की सबसे बड़ी मिसाल बन गया।
हाशिम बिन अब्दे मुनाफ़ – मक्का के महान नेता
हाशिम बिन अब्दे मुनाफ़ क़ुरैश के एक प्रभावशाली नेता थे। वे अपनी समझदारी और दरियादिली के लिए जाने जाते थे। “हाशिम” नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उन्होंने एक बार मक्का में पड़े अकाल के समय, रोटियाँ तोड़कर ग़रीबों में बाँटी थीं।
उन्होंने मक्का की व्यापारिक गतिविधियों को यमन और सीरिया तक फैलाया और काफिलों के लिए सुरक्षित रास्तों के समझौते किए। हाशिम ने “हल्फ़ुल फ़ुज़ूल” नामक एक ऐतिहासिक समझौते की भी हिमायत की, जिसमें मक्का के कई बड़े लोगों ने यह तय किया कि वे हर ज़ुल्म के शिकार व्यक्ति की मदद करेंगे। बाद में नबी ﷺ ने भी इस समझौते की तारीफ की और कहा कि अगर वो उस वक़्त मौजूद होते, तो उसमें शामिल ज़रूर होते।
हाशिम काबा की सेवा भी करते थे और हज करने वालों के लिए खाने-पानी का इंतज़ाम करते थे। उन्होंने यमन की एक समझदार महिला सलमा बिन्ते अम्र से शादी की, जिनसे उनका बेटा शैबा पैदा हुआ, जो बाद में अब्दुल मुत्तलिब के नाम से मशहूर हुए। दुर्भाग्यवश, हाशिम का इंतक़ाल एक व्यापारिक सफ़र के दौरान ग़ज़ा (सीरिया) में हो गया। लेकिन उनकी दानशीलता की कहानियाँ आज भी मक्का में सुनाई जाती हैं।
क्या आप जानते हैं?
हाशिम के काफिलों की वजह से मक्का को “दारुल अमान” यानी “शांति का घर” कहा जाने लगा था।
अब्दुल मुत्तलिब – ज़मज़म का पानी और हिम्मत की मिसाल
अब्दुल मुत्तलिब, जिनका असली नाम शैबा था, हाशिम के बेटे थे। उनकी परवरिश उनके चाचा मुत्तलिब ने की थी। वे बनी हाशिम के एक आदरणीय और बुद्धिमान नेता बने। उनका सबसे बड़ा कारनामा था — ज़मज़म के कुएं को दोबारा खुदवाना, जो सालों से सूखा पड़ा था। इस काम ने बनी हाशिम की इज़्ज़त को और बढ़ा दिया।
अब्दुल मुत्तलिब काबा की सेवा को अपना कर्तव्य मानते थे। एक बार यमन के राजा अब्राहा ने मक्का पर हमला कर दिया ताकि काबा को गिरा सके। उस समय अब्दुल मुत्तलिब ने क़ुरैश को एकजुट किया और अल्लाह से मदद की दुआ मांगी। अल्लाह ने छोटे-छोटे परिंदों की फ़ौज भेजकर अब्राहा की सेना को तबाह कर दिया। यह घटना ” आमुल फील ” यानी “हाथी का साल” के नाम से जाना जाता है।
अब्दुल मुत्तलिब के कई बेटों में से एक थे अब्दुल्लाह, जो अपनी खूबसूरती और नेक दिली के लिए मशहूर थे। उन्होंने मक्का की एक शरीफ़ औरत आमिना बिन्ते वहब से शादी की, जो बाद में नबी ﷺ की वालिदा बनीं।
अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब – एक रौशन नाम
अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब एक बेहद सुंदर और नेक इंसान थे। वे अपने वालिद अब्दुल मुत्तलिब के सबसे पसंदीदा बेटों में से एक थे। आमिना से उनकी शादी बनी हाशिम और एक बड़े क़ुरैशी ख़ानदान के बीच रिश्ते की मिसाल बनी।
लेकिन अफसोस, अब्दुल्लाह की ज़िंदगी बहुत छोटी रही। आमिना के गर्भवती होने के थोड़े ही दिनों बाद, अब्दुल्लाह व्यापार के सिलसिले में मदीना गए और वहाँ बीमार पड़कर इंतक़ाल कर गए। उस समय उनकी उम्र सिर्फ़ 25 साल थी। उनकी मौत ने पूरे मक्का को ग़म में डुबो दिया।
> क्या आप जानते हैं?
अब्दुल्लाह की खूबसूरती का यह आलम था कि मक्का की कई औरतें उनसे शादी करना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने आमिना को चुना।
उनकी मौत के वक़्त आमिना के पेट में वही नूर था, जो बाद में पूरी दुनिया को रोशन करने वाला बनकर आया – हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ।
बनी हाशिम बनाम बनी उमय्या – छुपा हुआ संघर्ष
हाशिम से अब्दुल्लाह तक, बनी हाशिम ने इंसाफ़, सच्चाई और दीनी खिदमत को अपना उसूल बनाया। लेकिन दूसरी तरफ़ बनी उमय्या, जो अब्दे मुनाफ़ के दूसरे बेटे अब्दे शम्स की औलाद थी, सियासी ताक़त के भूखे थे।
अब्दुल मुत्तलिब के कामों, ज़मज़म की खुदाई और “हाथी वाले साल” की लीडरशिप ने बनी हाशिम की शान को और ऊँचा किया। ये सब बनी उमय्या को एक चुनौती लगने लगा। उस समय ये लड़ाई छुपी हुई थी, लेकिन उसकी जड़ें गहराती जा रही थीं — और वही जड़ें आगे चलकर कर्बला के मैदान में एक बड़े हादसे की शक्ल में सामने आईं।
तो सवाल यह है:
क्या यह सिर्फ़ इज़्ज़त की जंग थी या दीन और दुनिया की टक्कर?
नतीजा और अगली कड़ी की झलक
हाशिम, अब्दुल मुत्तलिब और अब्दुल्लाह की ज़िंदगी ने बनी हाशिम को कुर्बानी और सच्चाई की मिसाल दी। यही परंपरा आगे चलकर हज़रत हुसैन तक पहुँची — और फिर कर्बला के मैदान में हज़रत हुसैन और उनके घरवालों ने उस परंपरा को अमल में लाकर अमर कर दिया।
अगली कड़ी में…
“कर्बला – शुरू से आख़िर तक” की अगली कड़ी में हम बात करेंगे हज़रत अबू तालिब की, जिन्होंने नबी ﷺ की हर मुश्किल में हिफ़ाज़त की और बनी हाशिम की शान को बनाए रखा।
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