इस्लाम और बिजनेस: एक भूली हुई सुन्नत

इस्लाम में व्यापार (बिज़नेस) सिर्फ रोज़गार नहीं बल्कि एक इबादत है। नबी करीम ﷺ, सहाबा और बुज़ुर्गों ने कारोबार किया, लेकिन आज मुस्लिम समाज खासकर उलमा और मदरसों ने व्यापार से दूरी बना ली है। इस पोस्ट में बताया गया है कि कैसे इस सोच को बदलना ज़रूरी है और आम मुस्लिम को स्किल सीखकर खुद का बिज़नेस शुरू करना चाहिए।

“व्यापार नबी की सुन्नत है, सिर्फ़ पैसा कमाने का ज़रिया नहीं

आज के दौर में जब हम इस्लाम की बातें करते हैं तो ज़्यादातर लोग इसे सिर्फ़ इबादतों तक ही सीमित समझते हैं — जैसे नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात वगैरह। लेकिन इस्लाम एक मुकम्मल ज़िंदगी का निज़ाम (Complete Way of Life) है जो इंसान की हर ज़रूरत को पूरा करने वाला मज़हब है। उसमें रोज़गार और व्यापार (बिज़नेस) की भी उतनी ही अहमियत है जितनी इबादतों की।

सभी पैग़म्बरों का कोई न कोई काम (पेशा) था

हमारे इस्लामी इतिहास में तमाम अंबिया (पैग़म्बर) ने मेहनत और हलाल कमाई के लिए काम किया: 

हज़रत आदम (अ.) किसानी (खेती)

हज़रत इदरीस (अ.) दर्ज़ी (सिलाई का काम)

हज़रत नूह (अ.) बढ़ई (लकड़ी का काम)

हज़रत मूसा (अ.) चरवाहा, मज़दूरी

हज़रत ईसा (अ.) हकीम (इलाज)

हज़रत मुहम्मद (ﷺ) व्यापारी (बिज़नेस मैन)

यानी मेहनत और व्यापार सिर्फ़ दुनियादारी नहीं, बल्कि पैग़म्बरों की सुन्नत है।

हज़रत मुहम्मद ﷺ का बिज़नेस मॉडल

हज़रत मुहम्मद ﷺ ने शादी से पहले कई सालों तक हज़रत खदीजा  का माल लेकर व्यापार किया। आपने सफ़र किये, माल बेचा और लोगों में अपने सच्चे और ईमानदार किरदार से पहचान बनाई।

आपको लोग “अमीन” (ईमानदार) और “सादिक़” (सच्चे) के नाम से जानते थे। यही एक कामयाब व्यापारी की सबसे बड़ी पहचान होती है।

हदीसों में बिज़नेस की अहमियत

  1. “सच्चा और ईमानदार ताजिर क़यामत के दिन नबियों, सिद्दीक़ों और शहीदों के साथ होगा।” (तिर्मिज़ी)
  2. “रिज़्क़ के 10 हिस्सों में से 9 हिस्से व्यापार में हैं।”

यानी सबसे ज़्यादा हलाल कमाई का रास्ता व्यापार है। अगर हम चाहते हैं कि हमारी रोज़ी बेहतर हो, तो बिज़नेस करना सीखना चाहिए।

आज के उलमा बिज़नेस पर क्यों नहीं बोलते?

ये बहुत अफ़सोस की बात है कि:

  • मदरसों में आज तक बिज़नेस, एकनॉमिक्स या फाइनेंशियल तालीम नहीं दी जाती।
  • जुमा के खुत्बे में सिर्फ़ इबादतों या आख़िरत की बातें होती हैं, लेकिन दुनियावी कामयाबी का इस्लामी तरीका नहीं बताया जाता।
  • उलमा खुद भी बिज़नेस से दूर रहते हैं, जिसकी वजह से वो दूसरों पर मोहताज हो जाते हैं।

नतीजा:

  • मुस्लिम नौजवान सिर्फ़ नौकरी के पीछे भागते हैं।
  • उलमा मस्जिद और मदरसे तक सीमित हो जाते हैं।
  • मुस्लिम समाज आर्थिक (फाइनेंशियल) रूप से कमज़ोर बन जाता है।

हल (Solution): अब क्या किया जाए?

1. बिज़नेस को इबादत समझकर किया जाए

जब नियत सही हो, माल हलाल हो, तरीक़ा ईमानदाराना हो — तो हर काम इबादत बन जाता है।

2. मदारिस (मदरसों) में फाइनेंशियल तालीम शामिल की जाए

ताकि उलमा भी खुदमुक़्तार बनें और दूसरों को भी सिखा सकें।

3. इस्लामी बिज़नेस मॉडल को अपनाया जाए

जहाँ झूठ, धोखा, सूद (ब्याज) और ज़ुल्म न हो।

4. युवाओं में एंटरप्रेन्योरशिप का शौक़ पैदा किया जाए

स्टार्टअप्स, ऑनलाइन बिज़नेस, स्किल्स और स्मार्ट वर्किंग की तरफ़ बढ़ें।

बिज़नेस की बरकतें (फायदे)

  • खुद की कमाई से ज़कात, सदक़ा देना आसान
  • दूसरों को रोज़गार देना (Employment)
  • खुदमुख़्तारी (Self-dependence)
  • दुनिया की इज़्ज़त और आख़िरत की भलाई
  • सुन्नत पर अमल

नतीजा (निष्कर्ष)

बिज़नेस करना सिर्फ़ पैसा कमाना नहीं, बल्कि ये सुन्नत है, इबादत है, और समाज की तरक्की का ज़रिया है।
अगर उलमा, तलबा और मुस्लिम नौजवान इस ओर ध्यान दें तो हमारी पूरी कौम इन्शा अल्लाह फाइनेंशियल और सामाजिक रूप से मजबूत बन सकती है।


सैफुल्लाह कमर शिबली

Leave a Reply

Scroll to Top