लेखक…… सैफुल्लाह कमर शिबली
क्या आपने कभी सोचा है?
वो उम्मत (कौम) जिसने अंधेरे में डूबी दुनिया को रोशनी दिखाई, जिसने ज्ञान और तरक्की की ऊँचाइयों को छुआ…
आज वही उम्मत तालीम (एजुकेशन) के मैदान में सबसे पीछे क्यों है?
जिस नबी (ﷺ) ने कहा:
“इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फर्ज़ है”,
आज उसी उम्मत के स्कूल और मदरसे दो अलग-अलग रास्तों पर क्यों चल रहे हैं?
आज हम उसी सवाल पर बात करेंगे:
इस्लामी इतिहास में ‘इल्म’ को ‘दीन’ और ‘दुनिया’ में क्यों बांट दिया गया? यह बंटवारा कब और क्यों हुआ? और इसका मुसलमानों पर क्या असर पड़ा?
इस्लाम में ज्ञान का असली मतलब
इस्लाम में ज्ञान को कभी “मज़हबी” या “दुनियावी” नहीं कहा गया।
कुरआन ने ज्ञान को “नूर (रोशनी)”, “हिकमत (बुद्धि)”, “हिदायत (मार्गदर्शन)” और “कुव्वत (ताक़त)” कहा है।
कुरआन कहता है:
क्या वो लोग जो जानते हैं, और वो जो नहीं जानते — बराबर हो सकते हैं?”
(सूरह ज़ुमर: 9)
हदीस में है:
इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फर्ज़ है”
(इब्ने माजह)
हज़रत अली (रज़ि.) कहते हैं:
“इल्म दौलत से बेहतर है, क्योंकि इल्म तुम्हारी हिफाज़त करता है, और दौलत की तुम्हें हिफाज़त करनी पड़ती है।”
ज्ञान को ‘दीन’ और ‘दुनिया’ में कब बाँटा गया?
पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद ﷺ के दौर में ऐसा कोई बंटवारा नहीं था।
वो ज़माना ऐसा था जहाँ एक ही इंसान कुरआन भी पढ़ता था और खजूर की खेती, तिब्ब (चिकित्सा), जंग की रणनीति और मिज़ाज को भी समझता था।
हज़रत उमर (रज़ि.) ने मिस्र के गवर्नर अम्र बिन अल-आस को कहा था कि वो यूनानी और क़िब्ती लोगों से उनका इल्म सीखें।
बग़दाद का “Bayt al-Hikmah” (ज्ञान का घर) — यहां कुरआन, हदीस, फिक़ह के साथ-साथ एस्ट्रोनॉमी, मैथ्स, मेडिकल साइंस, कैमिस्ट्री और यूनानी/फारसी/हिंदू विज्ञान की किताबें भी पढ़ाई जाती थीं।
लेकिन फिर गिरावट क्यों आई?
1. सियासी कमजोरी और खिलाफ़त का टूटना
– तालीम का सिस्टम बिखर गया, और इल्म से ज़्यादा हुकूमत की लड़ाई चलने लगी।
2. यूरोप का हमला और कॉलोनियल दौर (औपनिवेशिक काल)
– अंग्रेज़ों और फ्रांसीसी ताकतों ने मुसलमान मुल्कों पर कब्ज़ा किया और तालीमी सिस्टम को दो हिस्सों में बाँट दिया।
3. मदरसे और स्कूल का अलग होना
– मदरसों को सिर्फ़ कुरआन और हदीस तक सीमित कर दिया गया,
और स्कूलों से इस्लामी शिक्षा पूरी तरह निकाल दी गई।
4. उलेमा और आधुनिक विद्वानों के बीच दूरी
– एक तबका ‘दीन’ पढ़कर ‘दुनिया’ से कट गया,
और दूसरा तबका ‘दुनिया’ पढ़कर ‘दीन’ से दूर हो गया।
इसका नुकसान क्या हुआ?
1. उम्मत दो टुकड़ों में बंट गई
– एक वर्ग “मौलवी” कहलाया, दूसरा “दुनियादार”
– एक ने दुनिया छोड़ी, दूसरे ने दीन!
2. तालीम का स्तर गिरा
– डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट दीन से अंजान हो गए
– उलमा साइंस, टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट से कट गए
3. मीडिया, टेक्नोलॉजी, राजनीति गैर-मुस्लिमों के हाथ में चली गई
– और मुसलमान सिर्फ़ मस्जिद, मदरसे और फतवों तक रह गया
4. इस्लामी इतिहास में गिरावट
– आज कोई इब्न सीना, जाबिर बिन हय्यान, इब्न रुश्द, राज़ी क्यों नहीं है?
– क्योंकि हमने खुद ही इल्म का बैलेंस तोड़ दिया।
अब क्या किया जाए? (हल/समाधान)
1. मदरसों में साइंस, कंप्यूटर, इंग्लिश, इकनॉमिक्स को शामिल करें
– ताकि हाफिज डॉक्टर भी बन सके, और मुफ़्ती इंजीनियर भी।
2. स्कूलों और कॉलेजों में इस्लामी अध्ययन, नैतिकता और कुरआन की तालीम ज़रूरी की जाए
– ताकि हमारा वैज्ञानिक नमाज़ी भी हो, और ईमानदार भी।
3. इल्म का असली इस्लामी नज़रिया ज़िंदा किया जाए
– इल्म वही है जो इंसान को अल्लाह के करीब करे,
सिर्फ डिग्री या दौलत का ज़रिया न हो।
4. मां-बाप को सही तालीम दी जाए
– बेटा हाफिज बन रहा है? साथ में कंप्यूटर भी सिखाओ
– डॉक्टर बना रहे हो? साथ कुरआन भी सिखाओ!
आखिर में एक दिल से निकली अपील
ए उम्मते मुसलिमा!
इल्म कोई एक किताब का नाम नहीं, ये वो रोशनी है जो हज़रत आदम (अलैहि सलाम) से लेकर पैग़म्बर मोहम्मद ﷺ तक पहुंची।
उसे टुकड़ों में मत बांटो। वरना तुम खुद भी बिखर जाओगे।
दीन और दुनिया का इल्म अलग नहीं है —
दोनों का रब एक है, मकसद भी एक — “अल्लाह की रज़ा”।
अगर फिर से ओहदा, इज्ज़त और लीडरशिप चाहिए —
तो फिर से इल्म को जोड़ो।