कर्बला – शुरुआत से अंजाम तक | पहला भाग

"कर्बला की कहानी सिर्फ़ एक जंग नहीं, एक ऐसा इतिहास है जो सदियों पुरानी दुश्मनी, सत्ता की लालच और सच्चाई की खातिर दी गई कुर्बानी से जुड़ा है। इस पहले हिस्से में जानिए कैसे अब्द मनाफ़ के घर से शुरू हुई दो शाखाएँ — बनी हाशिम और बनी उमय्या — एक दिन इंसाफ और ज़ुल्म के बीच खड़ी हो गईं।"

लेखक……. सैफुल्लाह कमर शिबली

जब भी हम “कर्बला” का नाम सुनते हैं, तो दिल में एक अजीब सी भावनात्मक लहर उठती है। तपता हुआ रेगिस्तान, प्यास से तड़पते बच्चे, हज़रत हुसैन (रज़ि०) की अज़ीम कुर्बानी, और जुल्म की वो दास्तान जो आज भी आंखों को नम कर देती है। लेकिन क्या कर्बला की यह कहानी सिर्फ एक दिन या एक साल की है? नहीं! इसकी जड़ें सदियों पुरानी हैं, जब क़ुरैश के एक महान ख़ानदान से दो शाखाएं निकलीं – जिनकी दुश्मनी ने इतिहास का रुख बदल दिया।

आज हम कर्बला की कहानी को उसके शुरुआती बिंदु से समझेंगे। यह कहानी है अब्दे मुनाफ़ बिन क़ुसै की, जिनके घर से बनी हाशिम और बनी उमय्या की दास्तानें शुरू हुईं। यह कहानी है व्यापार की, राजनीति की, इज़्ज़त की, और एक ऐसी दुश्मनी की जो सदियों बाद कर्बला के मैदान में खून की लकीर बन गई।

आईए, इस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत करते हैं…

अब्दे मुनाफ़ बिन क़ुसै – एक सम्मानित नेता

अब्दे मुनाफ़ क़ुरैश कबीले के एक महान और प्रतिष्ठित सरदार थे। उनके पिता क़ुसै बिन कुलाब ने मक्का में क़ुरैश को संगठित किया था। उन्होंने ख़ाना-ए-काबा की सेवा को व्यवस्थित किया और मक्का को धार्मिक और व्यापारिक केंद्र बना दिया। अब्दे मुनाफ़ ने अपने पिता की इस विरासत को संभालते हुए और भी ऊंचाइयों पर पहुँचाया।

अब्दे मुनाफ़ अपनी बुद्धिमानी, उदारता, और व्यापार में माहिर होने के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने मक्का को शाम (सीरिया), यमन और दूसरे इलाकों के साथ व्यापार से जोड़ा। उनके समय में क़ुरैश की ताक़त और प्रतिष्ठा चरम पर थी।

उनके चार बेटों ने क़ुरैश की क़िस्मत को हमेशा के लिए बदल दिया:

हाशिम – बनी हाशिम के संस्थापक

अब्दे शम्स – जिनकी संतान बनी उमय्या कहलायी

मुत्तलिब – जो बाद में बनी हाशिम के समर्थक रहे

नौफल – जिनकी संतानों ने व्यापार में अहम भूमिका निभाई

लेकिन कहानी का असली फोकस दो भाईयों पर है – हाशिम और अब्दे शम्स। इन दोनों की नस्लों ने न केवल अरब, बल्कि पूरी दुनिया की दिशा को प्रभावित किया।

क्या आप जानते हैं?

“मुनाफ़” नाम इसलिए पड़ा क्योंकि अब्दे मुनाफ़ हर मुश्किल वक़्त में अपनी क़ौम के आगे खड़े होते थे।

हाशिम और अब्दे शम्स – दो रास्ते, एक शुरुआत

हाशिम और अब्दे शम्स अब्दे मुनाफ़ के दो अहम बेटे थे। एक रिवायत के अनुसार, ये दोनों जुड़वां भाई थे। कहा जाता है कि जब इनका जन्म हुआ, तो हाशिम का हाथ अब्दे शम्स की पेशानी से चिपका हुआ था। अरब के बुज़ुर्गों ने इसे एक निशानी माना कि इनकी औलादों के बीच एक दिन गहरा संघर्ष होगा।

हालांकि यह बात पूरी तरह ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है, लेकिन यह दास्तान बनी हाशिम और बनी उमय्या के बीच भविष्य में होने वाली दुश्मनी का प्रतीक बन गई।

हाशिम एक महान व्यापारी और रहनुमा थे। उन्होंने मक्का और शाम के बीच व्यापारिक समझौते किए, जिससे मक्का की अर्थव्यवस्था बहुत मज़बूत हो गई।
उनकी दरियादिली इतनी मशहूर थी कि वे ग़रीबों और मुसाफिरों को खाना खिलाते थे, इसीलिए उन्हें “हाशिम” यानी “रोटी तोड़ने वाला” कहा गया।

दूसरी तरफ, अब्दे शम्स भी एक प्रभावशाली व्यक्ति थे। वे व्यापार के साथ-साथ मक्का की राजनीति में भी दिलचस्पी रखते थे। उनकी नस्ल ने बाद में बनी उमय्या के रूप में राजनीतिक शक्ति को अपना लक्ष्य बनाया।

धीरे-धीरे इन दोनों भाईयों के रास्ते अलग हो गए, लेकिन एक खामोश जंग शुरू हो चुकी थी – व्यापार की, नेतृत्व की, और ख़ाना-ए-काबा की सेवा की

यह मुकाबला कहाँ तक गया?

हाशिम की मौत के बाद उनकी नस्ल को बनी हाशिम कहा गया। इस खानदान से अब्दुल मुत्तलिब जैसे अज़ीम रहनुमा पैदा हुए, जिनके बेटे अब्दुल्लाह के घर हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ का जन्म हुआ। बनी हाशिम की पहचान थी – सच्चाई, इंसाफ़, दरियादिली और दीन की सेवा

वहीं दूसरी ओर, अब्दे शम्स की नस्ल से बनी उमय्या वजूद में आए। इनके चर्चित नामों में उमय्या, हरब, अबू सुफ़ियान, मुआविया, और यज़ीद शामिल हैं। बनी उमय्या ने व्यापार से ज़्यादा सियासी ताक़त और हुकूमत को तरजीह दी। उन्होंने मक्का और बाद में शाम में अपनी सियासी जड़ें मज़बूत कीं।

इस मुकाबले की दिशा इस्लाम के बाद और ज़्यादा नाज़ुक हो गई। अब यह सिर्फ व्यापार और सत्ता का नहीं, बल्कि दीन और सियासत के टकराव में बदल गया।

क्या आप जानते हैं?

बनी हाशिम और बनी उमय्या दोनों ही ख़ाना-ए-काबा की सेवा में लगे थे,
लेकिन बनी हाशिम का मक़सद था दीन की सेवा,
जबकि बनी उमय्या चाहते थे राजनीतिक वर्चस्व।

संघर्ष की ओर बढ़ते कदम

हाशिम की मौत के बाद अब्दुल मुत्तलिब ने बनी हाशिम की कमान संभाली। उन्होंने ज़मज़म का सूखा कुआं दोबारा खोजा और खुदवाया – यह घटना बनी हाशिम की इज़्ज़त को और बढ़ा गई।

बनी उमय्या की तरफ़ से हरब बिन उमय्या और फिर अबू सुफ़ियान जैसे लोग मक्का की राजनीति में प्रभावशाली होते चले गए। उन्होंने बार-बार बनी हाशिम की लोकप्रियता को चुनौती दी।

इस दुश्मनी ने नया रूप तब लिया जब अबू सुफ़ियान ने इस्लाम की शुरुआत में नबी ﷺ के ख़िलाफ़ युद्धों का नेतृत्व किया।

ग़ज़वा-ए-बदर,

ग़ज़वा-ए-उहुद,

ग़ज़वा-ए-ख़ंदक –

इन सब में अबू सुफ़ियान क़ुरैश के लश्कर का नेतृत्व करते थे।

हालाँकि फत्ह मक्का (मक्का की विजय) के बाद अबू सुफ़ियान ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया, लेकिन उनकी औलाद –हजरत मुआविया और फिर यज़ीद – ने सियासी ताक़त को पाने की कोशिश जारी रखी।

कर्बला – एक नतीजा, सदियों की जड़ें

कर्बला का हादसा सिर्फ यज़ीद की ज़ुल्म या एक दिन की कहानी नहीं थी।
ये सदियों से चल रही दुश्मनी, सत्ता की भूख, और दीन से दूरी का नतीजा था।

अब्दे मुनाफ़ के घर से शुरू हुई दो शाखाएं – बनी हाशिम और बनी उमय्या – जिनकी राहें शुरू से अलग थीं, एक दिन कर्बला के तपते मैदान में आमने-सामने आ गईं।

बनी हाशिम ने हमेशा दीन की बुलंदी के लिए कुर्बानी दी,
जबकि बनी उमय्या की कुछ शख्सियतें सियासी हुकूमत को तरजीह देती रहीं।

इस फर्क ने इस्लामी इतिहास को दो हिस्सों में बाँट दिया –
एक तरफ हक़, और दूसरी तरफ सियासी ज़ुल्म।

यह थी हमारी सीरीज़ “कर्बला – शुरुआत से अंजाम तक” की पहली कड़ी।
आज हमने अब्दे मुनाफ़ के दौर से इस ऐतिहासिक कहानी की शुरुआत की।

अगली कड़ी में हम जानेंगे हाशिम बिन अब्दे मुनाफ़ की ज़िंदगी, उनके काम, और उस नस्ल के बारे में जो हमें नबी-ए-करीम ﷺ जैसा अज़ीम रहनुमा देती है।

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