क्या मदरसे में बच्चों की इज्ज़त महफुज है ?

मदरसा हो या स्कूल, आज बच्चों की इज़्ज़त और मासूमियत हर जगह खतरे में है। यह पोस्ट एक कड़वी लेकिन ज़रूरी हक़ीक़त को सामने लाती है – जिसमें मदरसों और स्कूलों दोनों में होने वाले यौन शोषण की बात की गई है। साथ ही, इसमें इस्लाही नज़रिया और ठोस समाधान भी पेश किए गए हैं ताकि बच्चों का भविष्य महफूज़ हो सके।

Saifullah Qamar Shibli

क्या कभी आपने सोचा है कि हमारे बच्चों की इज़्ज़त, उनकी मासूमियत और उनका भविष्य किन हाथों में है? क्या हमने कभी सवाल किया कि जिस जगह को नबी ﷺ के घर जैसा मुक़द्दस समझा जाता है – यानी मदरसा – अगर वहीं कोई बच्चा ज़ुल्म का शिकार हो जाए तो वो किससे शिकायत करेगा?

या अगर स्कूल या कॉलेज में कोई दरिंदगी हो जाए तो हम उसे “नॉर्मल” मानकर अनदेखा क्यों कर देते हैं?

आज हम एक कड़वी लेकिन ज़रूरी हक़ीक़त पर बात करेंगे:
मदरसे, स्कूल, कॉलेज – और इन जगहों पर बच्चों के साथ होने वाली लैंगिक हिंसा (लवातत / यौन शोषण)।

मदरसा: एक मुक़द्दस जगह, लेकिन…

मदरसा एक रूहानी और इल्मी जगह मानी जाती है। इसे “इल्म का मरकज़”, “नबी का वारिस इदारा”, और “दीन की नर्सरी” कहा जाता है। यहां कुरआन हिफ़्ज़ की जाती है, सुन्नतें सिखाई जाती हैं, और अख़्लाक की तरबियत दी जाती है।

लेकिन कुछ ख़बरें – और सैंकड़ों छुपाए गए सच – हमें मजबूर कर रहे हैं कि हम अब चुप न रहें।

चंद सुर्ख़ियाँ देखें:

BBC उर्दू (2018): “पाकिस्तान के मदरसों में बच्चों के साथ यौन ज़्यादती के दर्जनों केस, लेकिन ज़्यादातर दबा दिए जाते हैं”

The Hindu (2021): “उत्तर प्रदेश के एक मदरसे में उस्ताद पर 6 छात्रों के साथ यौन शोषण का आरोप”

New York Times (2019): “पाकिस्तान के दीनदार मदरसों में हज़ारों यौन शोषण के मामले, लेकिन पुलिस कार्रवाई कम, माता-पिता खामोश”

क्या ये सब सिर्फ मदरसों में होता है?

नहीं!
ये जुर्म स्कूल, कॉलेज, ट्रेनिंग सेंटर, हॉस्टल, खेल मैदान और यहां तक कि घरों तक में होते हैं।

कुछ आँकड़े देखें:

NCRB इंडिया (2022):
1,49,404 बच्चों के साथ यौन अपराधों में सिर्फ 3.2% धार्मिक संस्थाओं से जुड़े थे।
बाक़ी सभी स्कूल, कॉलेज, ट्यूशन और जान-पहचान वालों के ज़रिए हुए।

WHO रिपोर्ट (2021):
“दुनिया भर में बच्चों के 90% यौन शोषण के केस वो लोग करते हैं जो बच्चे के ‘परिवार या तालीमी हलक़े’ से जुड़े होते हैं।”

यानि ये गंदगी सिर्फ मदरसों में नहीं, हर जगह है।

फिर सवाल उठता है: हम सिर्फ मदरसों को ही क्यों निशाना बनाते हैं?

क्योंकि…

1. मदरसे का मक़ाम बहुत ऊँचा है।
ये सिर्फ स्कूल नहीं, दीन की पनाहगाह है।

2. यहाँ के बच्चे मेहमान ए रसुल होते हैं।

3. यहाँ के उस्तादों को नबी ﷺ का वारिस माना जाता है।

4. अगर यहाँ गंदगी हो, तो पूरा दीन बदनाम होता है।

इसलिए सबसे पहले इस्लाही शुरुआत हमें मदरसों से करनी चाहिए।

मदरसे में लवातत (लैंगिक शोषण) क्यों बढ़ रहा है?

1. छोटे बच्चों को हॉस्टल में अकेला छोड़ देना

2. उस्तादों का तन्हाई में बात करना या काम लेना

3. कोई निगरानी नहीं – न CCTV, न इन्स्पेक्शन

4. बड़े छात्रों को छोटे बच्चों पर हुक्मरान बना देना

5. शिकायत करने पर बच्चों को चुप करा देना: “मदरसा बदनाम हो जाएगा”

अब ज़रूरत क्या है? – हल क्या है?

1. 15 साल से छोटे बच्चों के लिए हॉस्टल बंद किया जाए

सिर्फ डे-टाइम तालीम दी जाए, रात को घर भेजा जाए।

2. हर मदरसे में CCTV कैमरा ज़रूरी हो

कमरा, वुज़ू खाना, कॉरिडोर – हर जगह निगरानी हो।

3. उस्तादों को बच्चों से अलग जगह पर फैमिली के साथ रखा जाए

4. बड़े और छोटे बच्चों को अलग-अलग रखा जाए

सोने की जगह भी अलग हो।

5. वालिदैन और कमेटी को ज़िम्मेदार बनाया जाए

हर महीने इन्स्पेक्शन हो, बच्चों से बात की जाए, शिकायत सुनी जाए।

इस्लाही पैग़ाम:

ना मदरसे को बदनाम करें, ना ज़ुल्म को छुपाएं

ना स्कूल को छोड़ें, ना दीन को कमज़ोर समझें

हमें सच बोलना होगा – सिर्फ अल्लाह के लिए।

क्योंकि हदीस में है

“अगर तुम कोई बुराई देखो तो उसे हाथ से रोको, न हो सके तो ज़ुबान से, और न हो सके तो दिल में बुरा समझो – और ये ईमान का सबसे कमज़ोर दर्जा है।” (मुस्लिम शरीफ़)

मदरसा हो या स्कूल, गाँव हो या शहर – बच्चों की इज़्ज़त सबसे पहले है।
हमें सिस्टम नहीं, ज़ुल्म बदलना है।
अगर मदरसे को बचाना है, तो पहले मदरसे के बच्चों को बचाना होगा

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