लेखक….. सैफुल्लाह कमर शिबली
क्या आप जानते हैं कि Facebook, WhatsApp और Instagram को चलाने वाली मेटा कंपनी रोज़ाना करोड़ों लोगों की सोच, जानकारी और भावनाओं को नियंत्रित करती है?लेकिन अगर मेटा को मजबूरन किसी एक को चुनना पड़े —
1.2 अरब मुस्लिम आबादी वाले 50 से ज़्यादा देशों को?
या फिर सिर्फ़ 1 करोड़ की आबादी वाले इज़राइल को?तो वो किसे चुनेगी?
इसका जवाब सिर्फ़ भावनाओं से नहीं, बल्कि बिजनेस, राजनीति और टेक्नोलॉजी के खेल से जुड़ा है।
इस लेख में हम जानेंगे:मेटा के फायदे किसके साथ हैं , किसके पास राजनीतिक ताकत है और क्या मेटा सिर्फ़ मुनाफे के लिए इंसाफ़ की आवाज़ को दबा सकती है?
1. मुस्लिम दुनिया बनाम इज़राइल – आबादी और असर की तुलना
आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते, लेकिन उन्हें सही नजरिए से समझना ज़रूरी है।
मुस्लिम दुनिया:50+ देश
कुल जनसंख्या: 1.2 अरब से अधिक (दुनिया की लगभग 25%)
सोशल मीडिया पर सक्रिय यूज़र्स: करोड़ों
इज़राइल:सिर्फ़ 1 करोड़ की आबादी
लेकिन टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, और साइबर सेक्योरिटी में अग्रणी
World Bank 2024 डेटा:इज़राइल की प्रति व्यक्ति आय (GDP per capita): $55,000
पाकिस्तान: $1,600,मिस्र: $4,000,इंडोनेशिया: $5,000 ,यानी मुस्लिम देशों की आबादी ज़्यादा है, पर खर्च करने की ताक़त कम।
और यही बात मेटा को इज़राइल के ज़्यादा करीब बनाती है।
2. मेटा का बिजनेस मॉडल – पैसा कहां से आता है?
मेटा कोई धर्म प्रचारक संस्था नहीं है।
उसका असली धर्म है – मुनाफ़ा (Profit)! मुस्लिम देश:अरबों यूज़र लेकिन प्रति यूज़र कमाई बहुत कम ($2–$10 सालाना)
वजह:आर्थिक तंगी,सरकारी बैन (जैसे ईरान में Facebook बंद),डिजिटल शिक्षा की कमी
इज़राइल:कम यूज़र लेकिन प्रति यूज़र कमाई $50–$60 सालाना ,
वजह:टेक कंपनियों का भारी निवेश,ऑनलाइन शॉपिंग और डिजिटल एडवरटाइजिंग में सक्रियता,AI और साइबर सेक्योरिटी कंपनियों के विज्ञापन
Statista 2024 रिपोर्ट: मेटा की 98% आमदनी विज्ञापन से होती है।
3. राजनीति का दबाव – अमेरिका किसके साथ है?
मेटा अमेरिका की कंपनी है।
और अमेरिका की विदेश नीति में इज़राइल को स्पेशल सहयोगी का दर्जा मिला है।अगर मेटा इज़राइल के खिलाफ़ जाए:
अमेरिकी कांग्रेस में CEO से जवाब तलबी
यहूदी विरोधी होने का आरोप
भारी जुर्माने
शेयर बाज़ार में गिरावट
अगर मेटा मुस्लिम देशों के खिलाफ़ जाए:
कुछ ट्रेंड्स चलेंगे (#BoycottFacebook)
कुछ ऐप्स अस्थायी रूप से बंद होंगे लेकिन कुछ हफ्तों बाद सबकुछ फिर से सामान्य
Al Jazeera (May 2021) के मुताबिक़:
गाज़ा पर हमले के दौरान Facebook ने फिलिस्तीनी पोस्ट हटा दीं – लेकिन मेटा को कोई स्थायी नुक़सान नहीं हुआ।
Turkish Ban 2023: तुर्की में अस्थायी बैन के बाद भी यूज़र्स वापस आ गए।
4. इज़राइल की लॉबियाँ – असली शक्ति
AIPAC और ADL जैसी संस्थाएँ अमेरिका और यूरोप में इतना ज़बरदस्त दबाव बनाती हैं कि सरकारें तक इनके सामने झुक जाती हैं।ये मेटा जैसी कंपनियों पर नज़र रखती हैं अगर कोई पोस्ट इज़राइल के खिलाफ़ हो, तो तुरंत कार्रवाई होती है Facebook/Meta के CEO मार्क ज़ुकरबर्ग को कांग्रेस में बुलाया जा सकता है
The Guardian (2022): AIPAC ने इज़राइल समर्थन के लिए $20 मिलियन से ज़्यादा खर्च किए। मुस्लिम देशों के पास ऐसी कोई ग्लोबल लॉबी नहीं है।
5. जब इंसाफ़ हार जाए – उदाहरण
2022 में, फिलिस्तीनी पत्रकार शिरीन अबू अकलेह को इज़राइली फौज ने गोली मार दी Facebook ने उनसे जुड़ी पोस्ट और फोटोज़ को हटाना शुरू कर दिया
The Intercept (May 2022): Facebook ने सफाई दी कि “गलती से” ऐसा हुआ, लेकिन कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई।
2021 में, फिलिस्तीनी यूज़र्स की पोस्ट को “terror content” कहकर हटाया गया
सवाल ये है – क्या ये सिर्फ़ तकनीकी गड़बड़ है या जानबूझकर किया गया
मेटा किसका साथ देगी? जवाब सीधा है:
मेटा इज़राइल के साथ खड़ी होगी।
वजह:मेटा को वहां ज़्यादा मुनाफ़ा मिलता है,
अमेरिका और यूरोप की सरकारें इज़राइल को सपोर्ट करती हैं
लॉबी सिस्टम मज़बूत है
मुस्लिम दुनिया आपस में बंटी हुई है
अंतिम अपील
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।डिस्क्लेमर (महत्वपूर्ण)>
यह लेख किसी भी धर्म, देश या समुदाय के खिलाफ़ नहीं है।
हमारा उद्देश्य केवल तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करना है ताकि आप खुद सोच सकें।