Saifullah Qamar Shibli
क्या आपने कभी सोचा है कि इस्लाम और सियासत (राजनीति) का आपस में क्या रिश्ता है?
क्या वाकई इस्लाम केवल नमाज़, रोज़ा और हज तक सीमित है?
क्या राजनीति एक दुनियावी चीज़ है जिससे इस्लाम का कोई ताल्लुक नहीं?
आज के इस दौर में बहुत से लोग कहते हैं – “धर्म को मस्जिद तक रखो, राजनीति को दुनियादारों के लिए छोड़ दो।”
लेकिन क्या यही इस्लाम है?
आईए आज जानते हैं कि इस्लाम का राजनीति से क्या नाता है।
इस्लाम – एक मुकम्मल (पूर्ण) जीवन-व्यवस्था
इस्लाम सिर्फ इबादत का नाम नहीं है।
इस्लाम एक मुकम्मल निज़ाम-ए-हयात (पूर्ण जीवन प्रणाली) है।
जिसमें इंसान की व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ज़िन्दगी के हर पहलू की रहनुमाई (मार्गदर्शन) मौजूद है।
क़ुरआन में अल्लाह पाक फ़रमाता है:
“हमने इस किताब (क़ुरआन) में कोई चीज़ छोड़ी नहीं है।”
(सूरह अल-अनआम, आयत 38)
तो जब हर चीज़ का ज़िक्र क़ुरआन में है, तो फिर राजनीति बाहर कैसे हो सकती है?
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ – एक पैग़म्बर ही नहीं, एक हाकिम भी थे
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ केवल नमाज़, रोज़ा सिखाने वाले धर्मगुरु नहीं थे।
आप ﷺ एक बहुत बड़े राजनीतिक नेता, सैनिक कमांडर, जज, और शासक भी थे।
मदीना का इस्लामी राज्य इसका सबसे बड़ा सबूत है।
मीसाक-ए-मदीना (मदीना समझौता) – यह एक लिखित संविधान था जिसमें मुस्लिमों, यहूदियों और दूसरे क़बीलों के अधिकार तय किए गए थे।
राजनयिक खत, संधियाँ, और युद्ध – यह सब इस्लामी राजनीति की स्पष्ट मिसालें हैं।
खुलफ़ा-ए-राशिदीन की राजनीति
हज़रत अबूबक्र, उमर, उस्मान और अली (रज़ि.) ने इस्लाम के राजनीतिक उसूलों पर एक न्यायप्रिय, जनहितकारी, और उत्तरदायी सरकार चलाई।
बैतुलमाल (राजकोष) की स्थापना हुई
न्यायालय, पुलिस व्यवस्था, और सार्वजनिक सेवाएँ लागू हुईं
गैर-मुस्लिमों को भी बराबर के अधिकार दिए गए
इनकी हुकूमतें आज के किसी भी आधुनिक लोकतंत्र से कहीं ज़्यादा इंसाफ़ पसंद और पारदर्शी थीं।
राजनीति से दूरी – मुसलमानों का पतन
जब मुसलमानों ने राजनीति को छोड़ दिया, और सिर्फ मस्जिद में इबादत तक इस्लाम को सीमित कर दिया,
तो:
ज़ालिम हुक्मरान हावी हो गए
क़ौम गुटों में बँट गई
इंसाफ़ और बराबरी खत्म हो गई
और उम्मत ज़वाल का शिकार हो गई
जो इस्लाम हमें ज़ुल्म के खिलाफ उठ खड़े होने का हुक्म देता है,
अगर हम उसकी उस तालीम को नज़रअंदाज़ करेंगे, तो नुक़सान किसका होगा?
इस्लामी राजनीति के उसूल
इस्लामी राजनीति का मतलब है:
जनता की सेवा
न्याय और समानता
ईमानदारी और पारदर्शिता
अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा
भ्रष्टाचार, झूठ और धोखे से दूर रहना
यह सियासत सत्ता की भूख नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा के लिए लोगों की भलाई का नाम है।
क्या मुसलमानों को राजनीति से दूर रहना चाहिए?
कई लोग कहते हैं – “धार्मिक लोग राजनीति न करें।”
तो सवाल ये है: अगर अच्छे लोग पीछे हटेंगे, तो जगह किसके लिए खाली होगी?
झूठे, मक्कार, भ्रष्ट लोगों के लिए।
इसलिए इस्लाम यह सिखाता है कि राजनीति में शरीफ, ईमानदार और जिम्मेदार लोगों को आना चाहिए, ताकि एक बेहतर समाज बन सके।
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सेक्युलरिज़्म का धोखा
आज की दुनिया सेक्युलरिज़्म का नारा देती है – “धर्म और सरकार अलग होने चाहिए।”
लेकिन क्या इस्लाम इस सोच को मानता है?
बिलकुल नहीं!
इस्लाम इंसान की पूरी ज़िन्दगी को एक साथ सुधारना चाहता है – मस्जिद से लेकर अदालत और सरकार तक।
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इस्लामी सियासत – एक कल्याणकारी मॉडल
इस्लामी राजनीति का मकसद:
मज़हब थोपना नहीं
सत्ता हथियाना नहीं
बल्कि:
इंसाफ़ देना
ज़रूरतमंदों की मदद करना
अमन और इंसानियत को कायम रखना
इस्लामी राजनीति में न केवल मुस्लिमों के, बल्कि ग़ैर-मुस्लिमों के हुकूक भी महफूज़ रहते हैं।
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आज के मुसलमानों की ज़िम्मेदारी
आज हमें चाहिए:
खुद भी राजनीतिक समझ पैदा करें
अच्छे और सच्चे लोगों को आगे लाएं
भ्रष्टाचार और जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाएं
और इस्लामी उसूलों पर समाज की बुनियाद रखें
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आख़िर में एक संदेश
इस्लाम एक मुकम्मल धर्म है।
यह हमें सिर्फ नमाज़ और रोज़ा ही नहीं सिखाता,
बल्कि हुकूमत, इंसाफ़, और जनता की सेवा भी सिखाता है।
इसलिए आज हमें ज़रूरत है कि हम:
इस्लाम को मस्जिद से बाहर लाएं
सियासत को कुरआन और हदीस की रोशनी में समझें
और उम्मत के बेहतरीन भविष्य के लिए आगे बढ़ें।