Saifullah Qamar Shibli
क्या आपने कभी सोचा है…
कि दुनिया में मक्का और खान-ए-काबा की जो सबसे पहली तस्वीरें ली गईं, वो एक गैर-मुस्लिम यूरोपी ‘जासूस’ ने ली थीं?
जी हाँ! और यही नहीं – उस व्यक्ति ने इस्लाम कबूल किया, मक्का पहुंचा, और कुरान की पहली रिकॉर्डिंग भी की।
यह कहानी एक आम फ़ोटोग्राफर या टूरिस्ट की नहीं, बल्कि एक ऐसे शख्स की है जो विज्ञान, भाषा, धर्म और जासूसी – सब कुछ मिलाकर एक अनोखा मिशन लेकर चला था।
वो यूरोपी जासूस कौन था?
उस व्यक्ति का नाम था Snouck Hurgronje (स्नूक हरग्रोन्ये)।
वह नीदरलैंड्स (हॉलैंड) का रहने वाला था और उसका असली नाम था क्रिस्टियान स्नूक हरग्रोन्ये।
उसका जन्म 1857 में हुआ था।
वह एक ओरिएंटलिस्ट (पूर्वी सभ्यता और इस्लामिक समाज का जानकार) था।
उसे अरबी, उर्दू, फारसी जैसी कई भाषाओं का ज्ञान था।
शुरुआत में उसका मकसद सिर्फ़ शोध करना था, लेकिन धीरे-धीरे उसका ये सफर एक जासूसी मिशन बन गया।
इस्लाम कबूल किया या सिर्फ़ दिखावा?
Snouck ने इस्लाम कबूल करने का ऐलान किया और अपना नाम रखा अब्दुल ग़फ़्फ़ार।
उसने दाढ़ी रखी, अरबी कपड़े पहने, नमाज़ पढ़ना सीखा और पूरी तरह मुस्लिम जैसा व्यवहार किया।
1884 में वह जेद्दा पहुंचा और फिर मक्का में दाखिल हुआ।
अब सवाल यह उठता है:
क्या उसने दिल से इस्लाम कबूल किया था?
या यह सब सिर्फ़ एक ड्रामा था ताकि मक्का में घुसकर अंदर की जानकारी हासिल की जा सके?
इसका पक्का जवाब आज तक नहीं मिला है।
कुछ लोग मानते हैं कि वह एक जासूस था, तो कुछ का मानना है कि वह दिल से मुसलमान बन गया था।
मक्का और खान-ए-काबा की पहली तस्वीरें
1885 में Snouck ने मक्का, मस्जिद-उल-हरम और खान-ए-काबा की कुछ बेहद कीमती और पहली तस्वीरें लीं।
ये तस्वीरें आज भी यूरोपी लाइब्रेरीज़ और म्यूज़ियम्स में सुरक्षित हैं।
इनमें खान-ए-काबा की पुरानी इमारत, ज़मज़म का कुंआ और हाजी लोगों की इबादत के नज़ारे देखे जा सकते हैं।
ये हमें एक सदी पहले के मक्का की झलक दिखाती हैं।
कुरान की पहली रिकॉर्डिंग?
Snouck ने तस्वीरों के अलावा कुरान की तिलावत की भी पहली रिकॉर्डिंग की थी।
उसने अरबी में अज़ान और सूरह फातिहा की आवाज़ को पुराने जमाने के ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड किया।
यह इतिहास में दर्ज कुरान की सबसे शुरुआती ऑडियो रिकॉर्डिंग्स में से एक मानी जाती है।
आज हम यूट्यूब पर कई क़ारियों की तिलावत सुन सकते हैं, लेकिन शायद आपको नहीं पता – इसकी शुरुआत एक यूरोपी “शोधकर्ता” से हुई थी!
ज्ञान, धर्म और राजनीति का अनोखा मेल
Snouck सिर्फ़ फ़ोटोग्राफर या रिकॉर्डिंग करने वाला नहीं था,
वह एक भाषाविद (लैंग्वेज एक्सपर्ट), इस्लामी विषयों का प्रोफेसर और आगे चलकर डच सरकार का सलाहकार भी बना।
उसने हज, मक्का की जिंदगी और इस्लामिक समाज पर ऐसी किताबें और रिपोर्ट्स लिखीं जो आज भी अकादमिक दुनिया में इस्तेमाल होती हैं।
इंडोनेशिया में मिशन
1890 में Snouck हरग्रोन्ये इंडोनेशिया पहुँचा।
वहां उसने डच सरकार को मुसलमानों को नियंत्रण में रखने के लिए सलाह दी।
वह मुसलमानों की धार्मिक भावनाएं, भाषा, रीति-रिवाज़ सब समझ कर यह बताता था कि उन्हें कैसे काबू में रखा जा सकता है।
यही वजह है कि उसकी पहचान दो हिस्सों में बंट जाती है:
- एक तरफ एक मुस्लिम स्कॉलर और मक्का का ज़ायर
- दूसरी तरफ एक उपनिवेशवादी (colonial) ताकतों का जासूस और मददगार
उसकी तस्वीरें और रिकॉर्डिंग आज कहाँ हैं?
Snouck की ली हुई तस्वीरें आज यूरोपीय म्यूज़ियम्स, डिजिटल आर्काइव्स और कुछ वेबसाइट्स पर मिलती हैं।
आप भी इंटरनेट पर “Snouck Hurgronje Mecca Photos” सर्च करके देख सकते हैं।
हमें इससे क्या सबक मिलता है?
Snouck की ये कहानी हमें कई बातें सिखाती है:
- ज्ञान की भूख इंसान को कहाँ से कहाँ पहुंचा देती है।
- धर्म और शोध के बीच दिल और दिमाग की कैसी टक्कर हो सकती है।
- और सबसे अहम बात —
हमें अपने धर्म, विरासत और तिलावत की अहमियत को खुद समझना चाहिए,
क्योंकि आज भी कई गैर-मुस्लिम हमारे इतिहास को सहेज रहे हैं, और हम?
क्या आपने कभी सोचा था कि मक्का की पहली तस्वीरें एक गैर-मुस्लिम ने ली थीं?
या कि कुरान की पहली रिकॉर्डिंग एक यूरोपी शख्स ने की?
तो सवाल यह है:
हमने खुद अपने मज़हब, विरासत और ज्ञान को सहेजने के लिए क्या किया?
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