Saifullah Qamar Shibli
दुनिया का इतिहास ऐसे कई वाक़ियात से भरा हुआ है जिन्होंने इंसानी तहज़ीब की शक्ल बदल दी। इन ही में से एक है सुल्तान मुहम्मद सानी (Muhammad Al-Fatih) यानी फातिह़ सुल्तान की वो फ़तह, जिसमें उन्होंने 1453 ई. में क़ुस्तुंतुनिया (Constantinople / Istanbul) को जीतकर पूरे जमाने का नक्शा बदल दिया। यह जीत सिर्फ़ एक शहर पर कब्ज़ा नहीं था बल्कि एक नई दौर की शुरुआत थी।
क़ुस्तुंतुनिया की अहमियत
क़ुस्तुंतुनिया आज का इस्तांबुल है। यह शहर उस वक़्त बाइज़ंटाइन साम्राज्य (Byzantine Empire) की राजधानी था।
- यह एशिया और यूरोप को जोड़ने वाला दरवाज़ा था।
- यहाँ से कारोबार, हुकूमत और मज़हबी सियासत पर क़ाबू रखा जाता था।
- मुसलमान सदियों से इस शहर को फतह करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन इसकी मज़बूत फौजी दीवारें और समुद्री किला इसे “ना जीतने वाला शहर” बना देती थीं।
रसूलुल्लाह ﷺ की मशहूर हदीस है:
“क़ुस्तुंतुनिया ज़रूर फतह होगा। कितना अच्छा होगा वह अमीर जो इसे फतह करेगा और कितनी अच्छी होगी वह फौज जो इसे फतह करेगी।”
(मुसनद अहमद)
यानी मुसलमानों के लिए यह शहर फतह करना सिर्फ़ सियासी नहीं बल्कि इमानी मिशन भी था।
सुल्तान मुहम्मद सानी का बचपन और तैयारी
सुल्तान मुहम्मद सानी, जिन्हें बाद में अल-फ़ातिह़ (फ़तह करने वाला) कहा गया, 1432 ई. में पैदा हुए।
- वे सुल्तान मुराद द्वितीय के बेटे थे।
- बचपन से ही कुरआन, हदीस, अरबी, फ़ारसी और यूनानी ज़बान सीखी।
- उनकी तर्बियत ऐसे की गई कि उनमें इल्म (ज्ञान), हिम्मत और लीडरशिप सब एक साथ मौजूद हों।
- कम उम्र में ही उन्हें फौज की कमान और हुकूमत की ज़िम्मेदारी दी गई।
वे अक्सर कहते थे:
“मैं वही हूँ जो अल्लाह के रसूल ﷺ की बताई हुई बशारत को पूरा करेगा।”
फतह की तैयारी
1451 ई. में जब वे सिर्फ़ 19 साल के थे, उन्हें ऑटोमन सल्तनत का सुल्तान बनाया गया।
उन्होंने सबसे पहले:
- फौज को नए हथियारों से लैस किया।
- यूरोप के इंजीनियरों की मदद से विशाल तोपें बनवाईं।
- बोस्फोरस (Bosporus) जलडमरूमध्य पर रूमेली हिसारी किला बनाया ताकि क़ुस्तुंतुनिया की सप्लाई लाइन बंद हो जाए।
- समुद्र और ज़मीन दोनों से हमला करने की पूरी तैयारी की।
1453 – क़ुस्तुंतुनिया का घेराव
अप्रैल 1453 में सुल्तान मुहम्मद सानी ने अपनी लगभग 2.5 लाख की फौज के साथ क़ुस्तुंतुनिया का घेराव कर लिया।
- बाइज़ंटाइन साम्राज्य के पास सिर्फ़ 10 हज़ार सैनिक बचे थे।
- शहर की दीवारें 1000 साल से ना टूटी थीं।
- मगर सुल्तान ने बड़ी तोप (Great Turkish Bombard) से दीवारें हिला दीं।
सबसे बड़ा कारनामा
समुद्र में एक बड़ी लोहे की ज़ंजीर डाली गई थी जिससे मुसलमानों के जहाज़ शहर के बंदरगाह में दाख़िल नहीं हो सकते थे।
सुल्तान ने अपने जहाज़ों को पहाड़ों और लकड़ी के लुढ़कते रास्तों से गुज़ारकर समुंदर के दूसरे हिस्से में पहुंचा दिया। यह नज़ारा देखकर दुश्मन दंग रह गया।
जीत का दिन – 29 मई 1453
लगभग 53 दिन के घेराव के बाद, 29 मई 1453 की सुबह मुसलमानों ने अंतिम हमला किया और क़ुस्तुंतुनिया फतह कर लिया।
- बाइज़ंटाइन साम्राज्य का खात्मा हो गया।
- सुल्तान मुहम्मद सानी सीधा हागिया सोफ़िया चर्च (Hagia Sophia) पहुँचे और वहाँ नमाज़ अदा की।
- इस शहर का नाम बदलकर इस्लामबोल (यानी इस्लाम का शहर) रखा, जो बाद में इस्तांबुल बना।
असर और नतीजे
- मध्य युग (Middle Ages) का अंत और नई दुनिया की शुरुआत:
यूरोप के लिए यह सबसे बड़ा झटका था। पुराना ईसाई साम्राज्य मिट गया।
- ऑटोमन सल्तनत की शान:
इस्तांबुल उसकी राजधानी बनी और 600 साल तक यह मुसलमानों के इल्म, तिजारत और हुकूमत का मरकज़ रहा।
- यूरोप की बेचैनी:
यूरोप ने मुसलमानों के बढ़ते असर को रोकने के लिए नई राहें तलाश कीं, और इसी के बाद अमेरिका और इंडिया तक समुंद्री सफर शुरू हुआ।
- इल्म और तहज़ीब का मरकज़:
इस्तांबुल इल्म (knowledge), फ़नून, मस्जिदों और तालीम का गहवारा बन गया।
यूरोप क्यों नहीं भूल पाया?
यूरोप आज भी इस फ़तह को अपनी “सबसे बड़ी शिकस्त” मानता है।
- उन्होंने अपने क्रूसेड (Crusades) के सपनों को टूटते देखा।
- ईसाई दुनिया का सबसे अहम शहर मुसलमानों के हाथ चला गया।
- यही वजह है कि यूरोपियन तारीख़ में 1453 को “क़यामत का साल” कहा गया।
सुल्तान मुहम्मद सानी की फ़तह सिर्फ़ तलवार की ताक़त नहीं बल्कि ईमान, इल्म और हिम्मत का नतीजा थी।
उन्होंने साबित किया कि जब नियत पाक हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो असंभव भी संभव हो जाता है।
क़ुस्तुंतुनिया की फ़तह ने मुसलमानों को इज़्ज़त और ताक़त दी, और यूरोप को हमेशा के लिए एक गहरी चोट दी। यही वजह है कि आज भी यह जीत दुनिया के सबसे अहम वाक़ियात में गिनी जाती है।