Saifullah Qamar Shibli
इस्लामी इतिहास में मदीना की इस्लामी रियासत एक ऐतिहासिक मोड़ था, जहाँ पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने न सिर्फ़ धार्मिक बल्कि सामाजिक और राजनीतिक इनसाफ़ की एक मिसाल क़ायम की। लेकिन जब यहूदियों को मदीना से निकाला गया, तो कई लोग सवाल उठाते हैं — क्या यह सिर्फ़ मज़हबी वजह से था? क्या इस्लाम में दूसरों के लिए जगह नहीं है? इस पोस्ट में हम जानेंगे उन तीन यहूदी क़बीलों की सच्ची कहानी जिन्होंने नबी ﷺ से समझौते कर के बार-बार उन्हें तोड़ा, साज़िशें रचीं और मदीना की रियासत को अंदर से गिराने की कोशिश की। यह कहानी है गद्दारी के खिलाफ़ इंसाफ़ की — और उस रहमत के पैगंबर ﷺ की, जो हर बार सब्र और इंसाफ़ के साथ जवाब देते रहे।
1. मदीना में यहूदियों की मौजूदगी
जब पैगंबर मुहम्मद ﷺ मक्का से हिजरत कर के मदीना आए, उस समय मदीना में तीन बड़े यहूदी क़बीले (जनजातियाँ) बसते थे:
- बनू क़ैनुक़ा
- बनू नज़ीर
- बनू क़ुरैज़ा
ये लोग बहुत अमीर, ताक़तवर और क़िलेबंद बस्तियों में रहते थे। उनके पास खेती, हथियार, और व्यापार के साधन थे। लेकिन इनमें से ज़्यादातर के दिलों में इस्लाम और पैगंबर ﷺ के लिए जलन और नफ़रत थी।
2. मदीना का संविधान: मीसाक-ए-मदीना
पैगंबर ﷺ ने मदीना आने के बाद यहूदियों और मुसलमानों के बीच एक लिखित समझौता किया, जिसे “मीसाक-ए-मदीना” कहा जाता है।
इस समझौते की शर्तें कुछ इस तरह थीं:
- हर धर्म को आज़ादी होगी
- मदीना पर हमला हुआ तो सब मिलकर उसका बचाव करेंगे
- कोई किसी बाहरी दुश्मन से गुप्त संबंध नहीं रखेगा
- न्याय, अमन और ईमानदारी से सब चलेंगे
यहूदी पूरी तरह अपने धर्म पर कायम रह सकते थे। उन्हें पूजा-पाठ, त्योहार, अपनी अदालतें और क़ाज़ी रखने की पूरी आज़ादी थी। पैगंबर ﷺ ने कभी उन्हें जबरन मुसलमान बनने के लिए मजबूर नहीं किया।
3. बनू क़ैनुक़ा की पहली बगावत
बद्र की जंग के बाद मुसलमानों को पहली बड़ी जीत मिली। इस जीत से यहूदी बहुत चिढ़ गए।
एक दिन एक मुसलमान औरत बाजार में गई। एक यहूदी ने उसके कपड़ों के साथ छेड़छाड़ की और बेइज्जती की। एक मुसलमान ने इसका विरोध किया तो यहूदियों ने उस मुसलमान को मार डाला।
ये घटना अमन समझौते की सीधी खिलाफ़वर्जी थी।
पैगंबर ﷺ ने समझदारी से बातचीत की, लेकिन उन्होंने अकड़कर जवाब दिया:
“तुमने बद्र में बस अनाड़ी मक्का वालों को हराया है, हमसे पाला पड़ा तो पछताओगे!”
नतीजा:
- 10 दिन का घेराव हुआ
- बिना किसी क़त्ले-आम के
- उन्हें मदीना से निकाल दिया गया
- वो शाम की तरफ़ चले गए
4. बनू नज़ीर की साज़िश
एक मुसलमान साथी के क़त्ल के बदले जब पैगंबर ﷺ ने “दियत” (मुआवज़ा) लेने के लिए बनू नज़ीर से मदद माँगी — जैसा कि मीसाक में तय था — तो उन्होंने ज़ाहिर में हाँ की लेकिन अंदर ही अंदर एक साज़िश रच डाली।
उन्होंने छत से पत्थर गिरा कर पैगंबर ﷺ को क़त्ल करने की योजना बनाई।
अल्लाह ने अपने नबी को इस साज़िश की जानकारी दे दी और आप वहां से हट गए।
नतीजा:
- उन्हें मदीना छोड़ने का आदेश दिया गया
- उन्होंने लड़ाई का इरादा किया, लेकिन हार गए
- बिना खून बहाए, सिर्फ़ जिन्होंने धोखा दिया, उन्हें मदीना से निकाला गया
- वो भी अपना सामान लेकर ख़ैबर चले गए
5. बनू क़ुरैज़ा की सबसे बड़ी गद्दारी
ख़ंदक की जंग में जब 10,000 दुश्मनों ने मदीना को घेर लिया, मुसलमान खाई के पीछे से बचाव कर रहे थे।
औरतें और बच्चे शहर के अंदर थे।
उसी समय, बनू क़ुरैज़ा ने गुप्त रूप से दुश्मनों से समझौता कर लिया कि:
- बाहर से दुश्मन हमला करे
- और अंदर से यहूदी हमला करें
- पूरा मदीना तबाह कर दिया जाए!
अगर ये योजना कामयाब हो जाती, तो इस्लाम का नाम तक मिट जाता।
नतीजा:
- घेराव के बाद यहूदी क़बीले ने खुद कहा: “हम, हज़रत सअद बिन मुअाज़ का फैसला मानेंगे”
- सअद बिन मुअाज़ ने कहा:
“तुमने युद्ध की साज़िश की है, इसलिए तुम्हारे ही धर्म (तौरात) के मुताबिक फैसला होगा”
और उनके अपने धर्म में भी युद्ध के गुनहगारों को कड़ी सजा दी जाती थी।
इसलिए सिर्फ़ उन्हीं लोगों को सज़ा दी गई, जो साज़िश में शामिल थे। आम नागरिकों, महिलाओं और बच्चों को नुक़सान नहीं पहुंचाया गया।
6. क्या यह सब मज़हब की वजह से था?
बिलकुल नहीं!
अगर ये सिर्फ मज़हब की वजह से होता, तो:
- कई यहूदी जो मदीना में रहे, उन्हें क्यों रहने दिया गया?
- नजरा के ईसाईयों से क्यों शांति समझौते हुए?
- हब्शा (इथियोपिया) के ईसाई राजा से क्यों दोस्ती रखी गई?
इस्लाम में मज़हबी आज़ादी और इंसाफ़ की मिसालें हर जगह मिलती हैं।
7. इस्लाम ने कभी ज़ुल्म नहीं किया
- नबी ﷺ ने कभी किसी यहूदी को जबरन मुसलमान नहीं बनाया
- कभी उनकी मस्जिद या पूजा स्थलों को नहीं गिराया
- कभी उनके त्योहारों पर पाबंदी नहीं लगाई
- लेकिन अगर कोई बार-बार ग़द्दारी करे, तो उसे सज़ा देना इंसाफ़ है — ना कि ज़ुल्म
आख़िरी सवाल: क्या आप खामोश रहेंगे?
अगर कोई आपके देश में रहकर बार-बार ग़द्दारी करे, दुश्मनों से मिलकर आपकी जान लेने की योजना बनाए — तो क्या आप चुप बैठेंगे?
पैगंबर ﷺ ने जो कुछ किया, वो एक सरकार के ज़िम्मेदार और इंसाफ़पसंद नेता के रूप में किया।
- यहूदियों को सिर्फ़ उनकी ग़द्दारी, साज़िश और समझौते तोड़ने की वजह से निकाला गया
- नबी ﷺ ने हमेशा इंसाफ़, रहमत और समझदारी से फैसले किए
- इस्लाम कभी ज़ुल्म नहीं करता — बल्कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा होता है
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क्योंकि झूठ की उम्र थोड़ी होती है — लेकिन सच हमेशा कायम रहता है!